रमने दे मुझको तू तुझ में
थमने दे मुझको तू तुझ में
बहकर निकल रहा हूँ तुझ से
जमने दे मुझको तू तुझ में
राहत मिलती मुझको तुझ में
खुशियाँ सारी मेरी तुझ में
तुझमें बीत रहे दिन मेरे
चाहत मिलती मुझको तुझ में
मेरा मन डोल रहा है तुझ में
साँसें बोल रहीं हैं तुझ में
खुद को तोल रहा हूँ तुझ में
खुद को खोल रहा हूँ तुझ में
मेरी जन्नत केवल तुझ में
मन्नत मेरी केवल तुझ में
साँसों की झंकृत तान मधुर
रसती-बसती है केवल तुझ में
मेरे जीवन की जान तुझी में
अपनापन सा मान तुझी में
सुर के सातों तान तुझी में
हो मेरा अवसान तुझी में
- जयशंकर पाठक