Saturday, 27 February 2021

मुक्तक

  मुझे रुख़सत किया तुमने, मगर चिर संगिनी हो तुम।

विचरता  बादलों  सा  हूँ, सुनहली  दामिनी  हो  तुम।

तृणक हूँ  मैं,  हवा  हो  तुम, तुम्हारे  साथ  उड़ता  हूँ -

विरह का राग हूँ यदि मैं, मिलन की  रागिनी हो तुम।

- प्रदग्ध

Wednesday, 13 December 2017

तुझी में

रमने दे मुझको तू तुझ में
थमने दे मुझको तू तुझ में
बहकर निकल रहा हूँ तुझ से
जमने दे मुझको तू तुझ में

राहत मिलती मुझको तुझ में
खुशियाँ सारी मेरी तुझ में
तुझमें बीत रहे दिन मेरे
चाहत मिलती मुझको तुझ में

मेरा मन डोल रहा है तुझ में
साँसें बोल रहीं हैं तुझ में
खुद को तोल रहा हूँ तुझ में
खुद को खोल रहा हूँ तुझ में

मेरी जन्नत केवल तुझ में
मन्नत मेरी केवल तुझ में
साँसों की झंकृत तान मधुर
रसती-बसती है केवल तुझ में

मेरे जीवन की जान तुझी में
अपनापन सा मान तुझी में
सुर के सातों तान तुझी में
हो मेरा अवसान तुझी में

                                           - जयशंकर पाठक

Monday, 11 September 2017

फिर भी कविता गाऊँगा ...

चाहे मुझपर व्यंग्य करो या चाहे तंग करो मुझको
चाहे कहो लिखने के खातिर घर मैं भेजा जाऊँगा
चाहे निलंबित कर दो या सेवा से मुक्त करो मुझको
मैं कवि हूँ दो टुक कहता हूँ फिर भी कविता गाऊँगा
.

मेरा मन

अभिनंदन है आप सबों का
मेरे मन के आँगन पर
तरस नहीं खाना पाठकगण
मेरे इस विरहापन पर
                                 विरहपूर्ण हैं राहें मेरी
                                 मंजिल है बस सूनापन
                                 हे पाठकगण आप सबों का
                                 स्वागत करता मेरा मन ...
.
 - जयशंकर पाठक

Sunday, 10 September 2017

मेरा मन

तेरे आते ही सपनों में ये साँसें डोल जाती हैं
तसव्वुर के तहों में भी हक़ीक़त घोल जाती है
मेरी ख़ामोश आँखों में हज़ारों राज़ ऐसे हैं
के लब चुप भी रहें लेकिन ये पलकें खोल जाती हैं
.
 - जयशंकर पाठक
(मेरा मन)

मेरी वेदना

ढल रही है शाम मानो , ढल रहा मेरा सफर
राह तो है दिख रहा पर रोशनी छंटने लगी है !
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एक भी रातें तुम्हारे बिन गुजरतीं थी नहीं पर
अब कई रातें तुम्हारे बिन यहाँ कटने लगी हैं !
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तेरी आहट से सदा मैं , चौंककर उठता रहा हूँ
अब हमारी नींद देखो , आए दिन घटने लगी हैं !
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स्नेह की सरिता सदा बहती रही है इस नयन में
अब तुम्हारी रुख़सती से , छाती यह फटने लगी है !
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तुम थी मुस्लिम,  मैं था हिन्दू , मजहबी सारा शहर था
एक मजहब से अनेकों जोड़ियाँ बँटने लगी है !
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छटपटाता दौड़ता हूँ , डूब जाने को भँवर में
किन्तु धाराएँ वहाँ से , आप ही हटने लगी है !
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  - जयशंकर पाठक
(मेरा मन)

मुक्तक

  मुझे रुख़सत किया तुमने, मगर चिर संगिनी हो तुम। विचरता  बादलों  सा  हूँ, सुनहली  दामिनी  हो  तुम। तृणक हूँ  मैं,  हवा  हो  तुम, तुम्हारे  सा...