मुझे रुख़सत किया तुमने, मगर चिर संगिनी हो तुम।
विचरता बादलों सा हूँ, सुनहली दामिनी हो तुम।
तृणक हूँ मैं, हवा हो तुम, तुम्हारे साथ उड़ता हूँ -
विरह का राग हूँ यदि मैं, मिलन की रागिनी हो तुम।
- प्रदग्ध
मेरी कलम तुम्हारे आदेशों की परवाह नहीं करती , चरणबन्दगी में झुककर बेमतलब की वाह नहीं करती मेरी कलम सदा मौलिक भावों का लेखन करती है , गैरों के अफसानों पर ताली की चाह नहीं करती !
मुझे रुख़सत किया तुमने, मगर चिर संगिनी हो तुम। विचरता बादलों सा हूँ, सुनहली दामिनी हो तुम। तृणक हूँ मैं, हवा हो तुम, तुम्हारे सा...
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