Wednesday, 13 December 2017

तुझी में

रमने दे मुझको तू तुझ में
थमने दे मुझको तू तुझ में
बहकर निकल रहा हूँ तुझ से
जमने दे मुझको तू तुझ में

राहत मिलती मुझको तुझ में
खुशियाँ सारी मेरी तुझ में
तुझमें बीत रहे दिन मेरे
चाहत मिलती मुझको तुझ में

मेरा मन डोल रहा है तुझ में
साँसें बोल रहीं हैं तुझ में
खुद को तोल रहा हूँ तुझ में
खुद को खोल रहा हूँ तुझ में

मेरी जन्नत केवल तुझ में
मन्नत मेरी केवल तुझ में
साँसों की झंकृत तान मधुर
रसती-बसती है केवल तुझ में

मेरे जीवन की जान तुझी में
अपनापन सा मान तुझी में
सुर के सातों तान तुझी में
हो मेरा अवसान तुझी में

                                           - जयशंकर पाठक

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