Sunday, 10 September 2017

मेरी वेदना

ढल रही है शाम मानो , ढल रहा मेरा सफर
राह तो है दिख रहा पर रोशनी छंटने लगी है !
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एक भी रातें तुम्हारे बिन गुजरतीं थी नहीं पर
अब कई रातें तुम्हारे बिन यहाँ कटने लगी हैं !
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तेरी आहट से सदा मैं , चौंककर उठता रहा हूँ
अब हमारी नींद देखो , आए दिन घटने लगी हैं !
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स्नेह की सरिता सदा बहती रही है इस नयन में
अब तुम्हारी रुख़सती से , छाती यह फटने लगी है !
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तुम थी मुस्लिम,  मैं था हिन्दू , मजहबी सारा शहर था
एक मजहब से अनेकों जोड़ियाँ बँटने लगी है !
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छटपटाता दौड़ता हूँ , डूब जाने को भँवर में
किन्तु धाराएँ वहाँ से , आप ही हटने लगी है !
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  - जयशंकर पाठक
(मेरा मन)

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